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Types of fever in hindi:बुखार के प्रकारो के बारे में सम्पूर्ण जानकारी

बुखार के प्रकारो के बारे में सम्पूर्ण जानकारी(Types of fever in hindi)

Table of Contents HIDE

1- वायरल बुखार(Viral Fever) :- 

वायरल फीवर(fever) एक ऐसे प्रकार का बुखार है जो किसी भी मौसम में हो सकता है, लेकिन मौसम परिवर्तन में बरसात के समय इस प्रकार के बुखार समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, क्योंकि इस समय वायरस कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो जाते हैं और फिर यह हमारे शरीर को संक्रमित कर देते हैं। वायरल फीवर एक प्रकार का संक्रमण रोग है, जो कि संक्रमण से फैलता है अगर परिवार में किसी भी सदस्य को वायरल फीवर है तो घर के बाकी सदस्यों को भी वायरल फीवर होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। वायरल फीवर अक्सर 4 से 5 दिनों के भीतर ठीक हो जाता है अगर वायरल फीवर ज्यादा दिन तक बना रहता है तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। वायरल फीवर आपको हर जगह मिल जाएंगे चाहे देश या विदेश और वायरल से सभी उम्र के लोग प्रभावित होते हैं। यह बुखार भी कभी-कभी अपने आप भी ठीक हो जाता है।

वायरल फीवर के कारण(Causes of viral Fever) :-

वायरल फीवर होने के कई कारण हो सकते हैं-

  •  मौसम परिवर्तन के कारण :- पहला सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है की जब भी मौसम परिवर्तन होता है तब वायरस एक्टिव हो जाते हैं और व्यक्ति के शरीर पर हमला कर देते हैं जिस व्यक्ति के अंदर वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं होती है उस पर वायरस हावी हो जाते हैं जिसके कारण वायरल फीवर होता है। मौसम परिवर्तन के समय ये वायरस ज्यादा तेजी से फैलते हैं|
  • दूषित खान-पान :- दूसरा कारण दुषित खान-पान है, अगर व्यक्ति किसी ऐसी जगह पर बैठकर कुछ खा रहा है अथवा ऐसे स्थान पर भोजन बन रहा है जो स्थान गंदा है तब भी वायरल फीवर होने की संभावना होती है क्योंकि इस स्थानों पर वायरल फीवर के वायरस ज्यादा तेजी से पनपते हैं। ऐसे स्थान का पानी भी ना पिये जिसके आस-पास गन्दगी हो।
  • संक्रमण या इन्फेक्शन :- अगला सबसे महत्वपूर्ण कारण संक्रमण इंफेक्शन को माना जाता है अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने गए हैं जो संक्रमित है अर्थात जिसे वायरल है तो इसकी संभावना बढ़ जाती है कि वायरल आपको भी हो सकता है इससे बचने के लिए उस व्यक्ति से मिलने के बाद अपने हाथों को अच्छी तरह से धोकर ही कुछ खाएं। 

वायरल फीवर के लक्षण(symptoms of viral Fever) :-

वायरल फीवर के कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  • आंखें लाल होना, 
  • आंखों में जलन होना जिसके कारण आंखों से पानी गिरना, 
  • खांसी आना या गले में खराश होना, 
  • बदन में दर्द होना, 
  • जोड़ों में दर्द होना, 
  • कब्ज की शिकायत, 
  • दस्त होना, 
  • थकान लगना या सुस्ती लगना, 
  • बुखार का तेज होना, 
  • सर्दी होना, 
  • गले में दर्द होना, 
  • सिर में दर्द होना, 
  • ठंड लगना, 
  • मतिभ्रम (असंभव कार्य होते हुए दिखाई देना जैसे गुड़िया का कमरे में उड़ना, कीड़ों का शरीर पर चलना आदि) इत्यादि।

वायरल फीवर का इलाज(treatment for viral Fever) :-

वायरल बुखार में आपको तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए अगर बुखार तेज है तो आराम करना चाहिए बुखार में हल्का खाना जैसे खिचड़ी, सूप और जौ की रोटी खाना चाहिए क्योंकि यह जल्दी पच जाती है और यह भोजन रोगी को उर्जा भी देते हैं। मरीज को साफ-सुथरे स्थान पर रखना चाहिए जिससे और संक्रमित ना हो और मरीज से भी दूरी बनाए रखना चाहिए उसके द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तु का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह भी संक्रमित होती है अगर हम उन वस्तुओं का प्रयोग करेंगे तो यह वायरल बुखार हमें भी हो सकता है यदि 102 डिग्री फारेनहाइट बुखार है तो मरीज की देखभाल घर पर ही रह कर भी की जा सकती है, अगर यह तापमान बढ़ता है तो मरीज को चिकित्सक को जरूर दिखाना चाहिए।

वायरल फीवर से बचाव(prevention of viral fever) :-

वायरल फीवर से अगर बचना है तो निम्नलिखित उपायों को करना होगा अथवा हम भी वायरल फीवर से ग्रसित हो सकते हैं-

  • बारिश में भीगने से बचना चाहिए, 
  • साफ पानी पीना चाहिए, 
  • अगर गर्मी ज्यादा है और धूप तेज है तो तेज धूप में निकलने से बचना चाहिए, 
  • सब्जियों को धोकर वह अच्छे से पका कर खाना चाहिए, 
  • सड़े गले फलों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनमें वायरस अधिक फैलने की संभावना होती है, 
  • वायरल से पीड़ित मरीज से दूर रहना चाहिए, 
  • अदरक वाली चाय का सेवन करें जिससे वायरल फीवर का प्रभाव ज्यादा ना पड़े।

2- डेंगू का बुखार(Dengue Fever) :- 

इस बुखार से हम सभी बहुत भली भाँति परिचित हैं, इसे एक और नाम से भी जाना जाता है ‘हड्डी तोड़ बुखार’ , इसे इस नाम से इसलिये जाना जाता है क्योंकि इससे पीड़ित लोगों के शरीर में इस प्रकार का दर्द होता है मानो उनकी हड्डी टूट गयी हो।डेंगू बुखार भी एक प्रकार का संक्रमक रोग होता है, जिसका कारण डेंगू वायरस होता है। डेंगू बुखार का इलाज समय पर होना नितांत आवश्यक है। डेंगू वायरस केवल मच्छरों के द्वारा ही फैलता है।

डेंगू के कारण(Causes of Dengue Fever ) :-

डेंगू बुखार ज्यादातर बरसात के दिनों में या बरसात के बाद होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस समय बारिश के कारण पानी कुछ जगह पर इकट्ठा हो जाता है और उनमें मच्छर अंडे देते हैं तो उनमें से डेंगू मच्छर पैदा होते हैं तथा इन मच्छरों पर सफेद व काले रंग की पट्टी होती है, जिस कारण से इन्हें टाइगर मच्छर अर्थात चीता मच्छर भी कहते हैं। यह मच्छर ज्यादातर दिन के समय काटते हैं तथा यह संक्रामक रोग एक वायरस से होता है जो कि एडीज एजिप्टी नाम की मादा मच्छर के काटने से फैलता है।

डेंगू के लक्षण( Symptoms of Dengue Fever ) :-

डेंगू में बुखार 2 से 7 दिन तक चलता है इसके कुछ लक्षण निम्न है- 

  • अचानक से तेज बुखार होना, 
  • मांस पेशी एवं जोड़ों में दर्द होना, 
  • भूख का ना लगना अथवा खाना खाने पर स्वाद का अनुभव ना होना, 
  • सिर में आगे की तरफ अर्थात माथे में तेज दर्द होना, 
  • आंख के पीछे दर्द होना तथा आंख को हिलाने पर दर्द होना, 
  • चक्कर आना, 
  • जी घबराना, 
  • उल्टी आना, 
  • शरीर पर खून के चकत्ते पड़ना, 
  • सफेद रक्त कणिकाओं का कम होना इत्यादि।

डेंगू के बुखार का प्राथमिक इलाज(primary treatment for Dengue Fever) :-

वैसे तो डेंगू के बुखार में डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए किंतु प्रारंभिक बुखार में आप यह प्रारंभिक उपचार कर सकते हैं-

  •  मरीज को आराम करना चाहिए,
  •  किसी भी प्रकार की दवा बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए, 
  • मरीज को O.R.S. का घोल देना चाहिए, 
  • भूख लगने पर पर्याप्त मात्रा में भोजन देना चाहिए, 
  • विटामिन-सी जैसे आंवला, नींबू अधिक मात्रा में लें जिससे शरीर की का सुरक्षा चक्र मजबूत होगा, 
  • तुलसी की पत्ती को उबालकर शहद के साथ पीने से इम्यूनीटी सिस्टम बेहतर होगा।

डेंगू बुखार से बचाव(Prevention of Dengue fever) :-

डेंगू के कुछ बचाव निम्न हैं, अगर इनका पालन किया जाये तो डेंगू जैसे भयानक रोग से बचा जा सकता है-

  • ऐसे स्थानों से पानी बाहर निकाले जहां पर पानी काफी दिनों से इकट्ठा हों अथवा ठहरा हुआ है,
  • कूलर इत्यादि के पानी हफ्ते में एक बार अवश्य बदले, 
  • पूरी पूरी बाँह तक की शर्ट तथा फुल पैंट पहने जिससे शरीर पूरी तरह ढका रहे, 
  • सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें, 
  • मच्छर भगाने वाली दवाई या वस्तु का प्रयोग करें,
  • कीटनाशक दवा घर के अंदर छिड़कवायें, 
  • मिट्टी का तेल नालियों में इकट्ठा हुए पानी पर डाले, 
  • लक्षण दिखने के पश्चात रोगी का उपचार तुरंत शुरू करना चाहिए।

3– चिकनगुनिया का बुखार(Chikungunya Fever) :- 

चिकनगुनिया का बुखार कैसा बुखार होता है जिसमें जोड़ों में भारी दर्द का अनुभव होता है। या रोग लंबे समय तक भी चल सकता है। इस बुखार में जोड़ों का दर्द कई हफ्तों अथवा महीनों के लिए बना रह सकता है। इस बुखार का उग्र चरण जिसको इसका सबसे बुरा चरण माना जाता है यह सिर्फ 2 या 4 दिन तक ही रहता है। 

चिकनगुनिया के कारण(Causes of Chikungunya Fever ) :-

चिकनगुनिया का बुखार मादा मच्छर के काटने से होता है जिसे एडिस इजिप्टी कहते हैं, उसके काटने से फैलता है। यह मादा मच्छर साफ पानी में पैदा होतीं हैंऔर दीन के समय काटती हैं। इस मच्छर के ऊपर सफेद व काली रंग की पट्टी होती हैं जिस कारण से इन्हें टाइगर मच्छर अथवा चीता मच्छर कहते हैं इसमें सबसे तेज बुखार 104 डिग्री फारेनहाइट तक जाता है या बुखार 3 से 4 दिन में कई बार उतरता चढ़ता है। इस बुखार में जोड़ों में दर्द होता है और यह दर्द बुखार उतरने के बाद भी कई महीने तक रह सकता है।

चिकनगुनिया के लक्षण(symptoms of Chikungunya Fever) :-

साधारण इस रोग को पूरे शरीर में फैलने में 2 से 4 दिन का वक्त लगता है इसके कुछ अन्य लक्षण निम्न है 

  • 102 डिग्री फारेनहाइट अथवा 39 डिग्री सेंटीग्रेड तक बुखार होना, 
  • हाथ पैर में चकत्ते पड़ना, 
  • शरीर में जोड़ों में असहनीय पीड़ा होना, 
  • सिर में दर्द होना, 
  • रोशनी अथवा प्रकाश से भय लगना, 
  • आंखों में दर्द होना,
  • नींद ना आना, 
  • कमजोरी लगना इत्यादि।

चिकनगुनिया के बुखार का इलाज(primary treatment for Chikungunya Fever) :-

चिकनगुनिया के घरेलू इलाज निम्न हैं- 

  • तुलसी :- तुलसी हर घर में आसानी से उपल्ब्ध हो जाती है अतः तुलसी की 10 पत्तियों को ले तथा आधा लीटर पानी ले फिर तुलसी की पत्तियों को पानी में डालकर तब तक उबालें जब तक पानी आधा ना हो जाए फिर उस पानी को छानकर थोड़ा-थोड़ा पिए। इसका सेवन कुछ दिन तक लगातार करें इसका सेवन करने से बुखार कम होगा तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। तुलसी की पत्तियों में एंटीमाइक्रोबियल्स नाम का एक तत्व होता है जो किसी भी बीमारी से उबरने में मदद करता है।
  • लहसुन :- लहसुन भी हर घर में आसानी सेउपलब्ध होता है 10 से 12 लहसुन की कलियों को लेकर उसे छीलकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी के साथ मिलाकर ग्राइंडर से पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को जोड़ों में दर्द वाली जगह पर लगाएं और कुछ देर के लिए लगाकर छोड़ दें इससे दिन भर में तकरीबन 2 बार लगाएं। इससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलेगी तथा सूजन को भी कम करता है और रक्त के प्रवाह को भी अच्छा करता है। 
  • शहद व नींबू :- शहद और नींबू भी अधिकतर रोगों के लिए अच्छे माने जाते हैं। एक चम्मच शहद आधा नींबू व एक गिलास पानी ले। पानी को गर्म करके उबाल लें अब उसमें नींबू और शहद मिला लें अब इसे पिए। आप चाय में भी नींबू और शहद मिलाकर पी सकते हैं इसे दिन में एक से दो बार पिए, शहद में एंटीबैक्टीरियल वह माइक्रोबियल का गुण पाया जाता है जो कि बीमारियों से लड़ने में मदद करता है, वही नींबू बुखार से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
  •  पपीते का पत्ता :- चिकनगुनिया के बुखार में सबसे कारगर उपाय पपीते के पत्ते से होता है 7 से 8 पपीते के पत्ते को लेकर साफ पानी से धोकर बीच में से मोटर डंठल को तोड़ ले, अब पत्ते को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर साफ पानी से मिलाकर ग्राइंडर में पीस कर पेस्ट बना लें, अब पेस्ट को छानकर उससे जो रस निकलता है उसे दो से तीन चम्मच हर 3 घंटे में भी है। इसे 2 से 3 दिन तक लगातार प्रयोग में लाएं चिकनगुनिया में प्लेटलेट्स जो कि तेजी से घटता है वह इस उपाय के बाद बड़ी तेजी से कवर होने लगेगा अथवा ठीक होने लगेगा इसीलिए पपीते का पत्ता चिकनगुनिया के बुखार में सबसे ज्यादा उपयोगी माना जाता है।
  •  हल्दी :-  हल्दी भी हर घर में उपलब्ध होती है वह लाभदायक भी होती है। आधा चम्मच हल्दी पाउडर को एक गिलास गर्म दूध में मिलाकर पीने से चिकनगुनिया से लड़ने में मदद मिलती है, इसे दिन में दो बार पीना चाहिए। हल्दी दूध का प्रयोग अंदरूनी चोट वर जख्मों को भरने में भी किया जाता है, इससे सुंदरता भी बढ़ती है।

चिकनगुनिया से बचाव(prevention of Chikungunya fever) :-

जो बचाओ निम्न बताए गए हैं अगर इनका पालन किया जाए तो चिकनगुनिया के बुखार से बचा जा सकता है-

  • चिकनगुनिया और डेंगू के मच्छर साफ पानी में पैदा होते हैं अतः जहां कहीं भी पानी इकट्ठा हो उसे इकट्ठा ना होने दें तथा कूलर का पानी समय-समय पर बदलते रहे अगर आप यह कार्य करने में असमर्थ हैं तो कूलर के पानी में थोड़ा सा मिट्टी का तेल डाल दें। फ्रीज में लगी वोटर ट्रे तथा फूल दानों में भी पानी इकठ्ठा ना होते इसका ध्यान रखें, 
  • भोजन तथा पानी को हमेशा ढक कर रखें, 
  • पूरी बाँह वाले कपड़े पहने तथा फुल पैंट पहने, 
  • मच्छरदानी लगाकर सोए, 
  • मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाए तथा मच्छर भगाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल करें, 
  • तुलसी का पौधा घर के आसपास लगाएं, 
  • घर के अंदर कपूर जलाएं इससे मच्छर भाग जाते हैं, 
  • नीम के तेल का दीपक जलाएं, 
  • कुछ भी खाने से पहले हाथ जरूर धुले।

4- टायफाइड का बुखार(Typhoid Fever) :- 

टाइफाइड के बुखार को ‘मियादी बुखार’ के नाम से भी जाना जाता है। यह भी एक प्रकार का संक्रमण रोग है, जिसके कारण या तेजी से फैलता है। यह बुखार बच्चों को ही नहीं बल्कि बड़ों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। यह संक्रमित रोग गंदे पानी से नहाने तथा गंदे पानी से बने भोजन को खाने से तथा गंदा पानी पीने से भी फैलता है। यह एक सेलमोनेला टायफाई नाम के बैक्टीरिया के द्वारा फैलता है अगर घर में किसी भी आदमी को टाइफाइड है तो घर के और भी सदस्यों को यह संक्रामक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।

टायफाइड के कारण :-

टाइफाइड की कुछ प्रमुख कारण निम्न है 

  • गंदे शौचालय का उपयोग करना, 
  • हाथों को ठीक प्रकार से ना धोना, 
  • गंदी जगहों पर भोजन करना, 
  • गंदी जगह पर भोजन बनाना, 
  • सब्जी को बिना धुले पकाना, 
  • दूषित दूध से बने उत्पादों का सेवन करना, 
  • किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से भी टाइफाइड होता है इत्यादि।

टायफाइड के लक्षण :-

  •  बुखार काफी तेज होना (103°F या 104°F), 
  • इसमें बुखार की अवधि 1 से 2 हफ्ते होती है, 
  • पेट में दर्द होना, 
  • भूख का ना लगना, 
  • सिर तथा शरीर के अन्य भागों में दर्द का अनुभव होना, 
  • सुस्ती लगना, 
  • दस्त की शिकायत होना, 
  • कब्ज की शिकायत होना इत्यादि।

टायफाइड के प्राथमिक इलाज :-

टाइफाइड होने पर डॉक्टर की सलाह अवश्य लें परंतु कुछ प्राथमिक उपचार भी निम्न हैं जो कि आप कर सकते हैं 

  • तरल पदार्थों का सेवन बढ़ाएं, 
  • O.R.S. का घोल बनाकर पिए,
  • खट्टे पदार्थों का सेवन करें जिससे शरीर की गर्मी बाहर निकलेगी तापमान सामान्य होगा, 
  • लहसुन अधिक मात्रा में खाएं, 
  • तुलसी की पत्ती को चाय तथा तुलसी से बने अन्य पदार्थों के साथ सेवन करें, 
  • लौंग का सेवन करें जिससे उल्टी दस्त में आराम मिलेगा, 
  • केले खाएं जिससे बुखार तथा दस्त में आराम मिलेगा, 
  • छाछ तथा मट्ठा पियें जो कि निर्जलीकरण से निकलेगा।

टायफाइड से बचाव :- 

  • हमेशा कुछ भी खाने से भी पहले हाथ धुलना चाहिये जिससे बैक्टीरिया शरीर में ना जाएं, 
  • शौच से आने के बाद भी अच्छे से हाथ धुले, 
  • घर में पैदा हो रही कीटों की सफाई करें तथा मक्खी और तिलचट्टा से भी बीमारियां फैलती है,
  • जल को कहीं भी इकट्ठा ना होने दें एक अच्छी जल निकासी प्रणाली बनाएं,
  • पानी को खुला ना रखें, 
  • भोजन को स्वच्छ स्थान पर बनाएं एवं खाएं,
  • टाइफाइड से बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं उन्हें लगवाना चाहिए।

5- दिमागी बुखार(Brain Fever) :- 

हम सभी ने मौसम के परिवर्तन के समय तथा बरसात के समय लोगों को बुखार होते हुए देखा है तथा सुना भी है। दिमागी बुखार के मरीजों की संख्या में हर साल बढ़ोतरी होती रहती है। दिमागी बुखार तब होता है जब बुखार व्यक्ति के मस्तिष्क अथवा दिमाग पर हावी हो जाता है इसमें व्यक्ति बहकी-बहकी बातें करने लगता है तथा उसे कभी-कभी भ्रम की स्थिति भी पैदा हो जाती है। अगर दिमागी बुखार के लक्षण दिखाई दे तो मरीज को डॉक्टरों को जरूर दिखाना चाहिए।

दिमागी बुखार के कारण :- 

  • यह प्रकार का संक्रमण है, जो कि एक घातक विषाणु इंसेफेलाइटिस के कारण से होता है। 
  • यह घातक विषाणु इंसेफेलाइटिस दो प्रकार के होते हैं प्राइमरी इंसेफेलाइटिस तथा सेकेंडरी इंसेफेलाइटिस।  प्राथमिक इंसेफेलाइटिस में विषाणु सीधे दिमाग अर्थात मस्तिष्क को प्रभावित करता है तथा सेकेंडरी इंसेफेलाइटिस विषाणु रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करके उसे कमजोर कर देता है। 
  • दिमागी बुखार स्किन इन्फेक्शन से अर्थात हर्पीज सिंप्लेक्स जो कि त्वचा से तंत्रिका तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क से जुड़ा होता है। 
  • बचपन में खसरा, रूबेला, चिकन पॉक्स आदि के टीके ना लगे होने पर भी दिमागी बुखार की शिकायत हो सकती है। 
  • कीड़े मकोड़े के काटने से भी दिमागी बुखार होता है। 
  • गाय, भैंस, बकरी अथवा भेड़ का कच्चा दूध पीने से भी यह संक्रामक रोग फैलता है।

दिमगी बुखार के लक्षण :- 

  • सिर में दर्द होना, 
  • गर्दन में अकड़न होना, 
  • उल्टी होना, 
  • चमकदार रोशनी के प्रति संवेदनशील होना, 
  • भ्रम की स्थिति पैदा होना, 
  • दौरे पड़ना, 
  • छोटे चकत्ते जो छोटे तथा लाल रंग के धब्बे की तरह दिखाई पड़ते हैं शरीर पर उभर आना, 
  • सुस्ती लगना इत्यादि।

दिमागी बुखार के प्रथमिक इलाज :- 

  •  शरीर को आराम दें, 
  • रोगी को शांत तथा अंधेरे कमरे में रखे, 
  • O.R.S. का घोल दें, 
  • अनार का जूस पिलाएं, 
  • लहसुन ज्यादा खाएं, 
  • तरल पदार्थ का सेवन अधिक करें,
  • दर्द को कम करने के लिए डॉक्टर के द्वारा बताई गई दर्द की दवा ले।

दिमागी बुखार से बचाव :- 

  • हाथ को अच्छे से धो कर भोजन इत्यादि करें। 
  • शौचालय के उपरांत हाथ को अच्छे से धो लें। 
  • भीड़भाड़ वाले इलाके से आने के बाद हाथ धोएं। 
  • किसी प्रकार के संक्रमित व्यक्ति से मिलने के पश्चात हाथ कोअच्छी प्रकार से धुलें।  
  • किसी भी प्रकार की चीज जैसे पानी का गिलास, खाने का बर्तन, कोल्ड ड्रिंक की स्ट्रा, टूथब्रश इत्यादि किसी के साथ शेयर ना करें। 
  • नियमित व्यायाम करें। 
  • ताजे फल व सब्जियों को धूल कर खाएं। 
  • खांसते व छींकते समय मुंह पर तथा नाक पर हाथ रखकर अथवा रुमाल रखकर खांसे अथवा छींके। 
  • कच्चे दूध से बने किसी भी चीज का सेवन ना करें।

6- मलेरिया का बुखार(Malaria Fever) :- 

यह एक भयंकर संक्रामक रोग है और सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या भी है। मलेरिया परजीवी का वाहक एपोफ़िलेज़ नामक मादा मच्छर के काटने से होता है। मच्छर के काटने पर यह लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश करके बहुगुणित अर्थात् कई भागों में बांटने लगते हैं जिससे रक्त हीनता (एनीमिया) का लक्षण उभरने लगता है, जिसके अंतर्गत चक्कर आना, सांस फूलने, इत्यादि लक्षण होते हैं। यह बुखार ज्यादातर उन क्षेत्रों में होता है जिनमें गर्मी अर्थात उष्णता ज्यादा होती है इस रोग से प्रत्येक वर्ष 40 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं तथा उनमें से 2.5 से 3% लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। जिसमें अफ्रीका के लोगों की मरने की संख्या सबसे ज्यादा होती है।

मलेरिया का कारण :-

मलेरिया प्लाज्मोडियम गण के प्रोटोजोआ परजीवी के कारण फैलता है- 

  • मलेरिया परजीवी की प्राथमिक पोषक एनोफ़िलीज नाम मादा मच्छर होती है। 
  • मादा मच्छर ही खून से पोषण लेती है। 
  • शाम के समय मच्छर का काटना। 
  • इकट्ठा हुए पानी पर ही मादा मच्छर अंडे देते हैं अतः कहीं भी पानी इकट्ठा ना होने दें। 
  • शाम के वक्त आधी बाँह के कपड़े पहनना तथा हाफ पैंट में रहना। 
  • मच्छरदानी का प्रयोग सोते वक्त ना करना।

मलेरिया के लक्षण :-

मलेरिया के लक्षण निम्न प्रकार है, अगर यह लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

  • कपकपी लगना, 
  • बुखार आना, 
  • जोड़ों में दर्द होना, 
  • उल्टी होना, 
  • रक्त का विनाश होना, 
  • मूत्र से हीमोग्लोबिन का ह्रास होना, 
  • दौरे आना इत्यादि। 

मलेरिया के आम लक्षण में कपकपी लगना तथा ठंड लगने के तुरंत बाद ही बुखार का आना एक प्रमुख लक्षण माना जाता है तथा यह बुखार 3 से 4 घंटे बाद अपने आप उतर जाता है तथा बुखार उतरने के पश्चात पसीना भी आता है।

मलेरिया के घरेलू इलाज :-

मलेरिया के लक्षण दिखाई देने पर हमेशा डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, वैसे कुछ घरेलू इलाज निम्न हैं-

  • अदरक :- मलेरिया के लिए सबसे अच्छा घरेलू उपचार अदरक है इस को उबालकर बनाया गया काढ़ा आपकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। 
  • दालचीनी :- बुखार दस्त और सिरदर्द में से निपटने के लिए दालचीनी एक अच्छा विकल्प है। 
  • तुलसी :- तुलसी भी मलेरिया को ठीक करने के लिए एक सर्वोत्तम उपाय है। 
  • नारंगी का जूस पीने से प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है।

मलेरिया से बचाव :- 

  • घरों के अंदर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करवाएं। 
  • घरों के अंदर व घर के आस-पास कहीं भी पानी इकट्ठा ना होने दें। 
  • अगर उस पानी को निकालने में असमर्थ हैं तो उसमें थोड़ा सा मिट्टी के तेल डाल दें। 
  • साफ पानी में मच्छर जल्दी पैदा होते हैं इसलिए सप्ताह में एक बार पानी की टंकी, मटके, कूलर इत्यादि को खाली करके सूखा करके फिर भरे। 
  • खिड़कियों में जाली लगवाएं ताकि मच्छर घर के अंदर ना घुस पाए। 
  • मच्छरदानी का प्रयोग सोते समय करें।

7- कमजोरी के कारण होने वाला बुखार :- 

कमजोरी व थकान के कारण भी कभी-कभी बुखार की स्थिति पैदा होती है, ऐसा तभी होता है जब व्यक्ति बहुत कमजोर हो गया हो। कमजोरी के कारण ऐसा भी हो सकता है कि शरीर का कोई हिस्सा अाप न हिला पा रहे हो, उस हिस्से में झटका, ऐंठन अथवा झुनझुनी लग रही हो। कमजोरी के बहुत कारण हो सकते हैं जैसे किसी कार्य को लंबे समय तक करना जिसके माध्यम किसी भी प्रकार का ब्रेक ना लेना और पौष्टिक भोजन ना करना इत्यादि तथा जब व्यक्ति लंबे समय तक बिना किसी मध्यांतर अथवा ब्रेक के कार्य कर रहा होता है तो उसे थकान भी महसूस होती है, जिससे बुखार की स्थिति पैदा होती है।

कमजोरी के कारण :- 

  • कमजोरी चिंता के कारण भी हो सकती है, 
  • सुस्ती के कारण भी हो सकती है, 
  • उम्र के कारण भी कमजोरी लगती है, 
  • किसी कार्य को लगातार बिना किसी ब्रेक के करना, जिसके कारण थकान लगती है फिर कमजोरी लगने लगती है, 
  • बीमारी के कारण कमजोरी लगती है,
  • विटामिन की कमी के कारण भी कमजोरी लगती है, 
  • खून की कमी होने पर भी कमजोरी लग सकती है।

लक्षण :-

अगर आपको कमजोरी है तो उसके कुछ लक्षण निम्न है- 

  • कमजोरी के कारण प्रभावित अंग को किसी भी कार्य को करने में देरी होना, 
  • कमजोरी के कारण प्रभावित अंग में कपकपी या झटके अथवा झुनझुनी महसूस होना, 
  • नजर कमजोर होना, 
  • बेहोशी आना, 
  • उलझन होना, 
  • बोलने व खाने में कठिनाई होना, 
  • शरीर में बुखार जैसे लक्षण दिखाई पड़ना, 
  • दिल का अनियमितता से धड़कना।

कमजोरी के कुछ सरल इलाज :- 

  • संक्रमण के कारण आई कमजोरी को डॉक्टर के द्वारा बताई गई दवा से दूर किया जा सकता है, 
  • विटामिन की मात्रा अपने भोजन में बढ़ाए, 
  • अधिक काम कर रहे हैं तो बीच-बीच में ब्रेक ले,
  • मांस पेशियां कमजोर है तो जीवन शैली में परिवर्तन करें, 
  • डिप्रेशन के कारण आई कमजोरी को एंटीडिप्रेसेंट दवाओं से थकान को दूर किया जा सकता है।

कमजोरी से बचने के उपाय :- 

  • शराब का सेवन कतई ना करें, 
  • ज्यादा एक्सरसाइज तथा डाइटिंग ना करें, 
  • पूरी नींद लें, 
  • पोषक तत्वों से भरपूर आहार का सेवन करें, 
  • सुबह या शाम को पार्क जैसे स्थानों पर समय व्यतीत करें, 
  • ज्यादा फैट वाले भोजन ना करें, 
  • लगातार थकान और कमजोरी महसूस हो तो डॉक्टर से सलाह लें, 
  • अगर व्यायाम नहीं करते हैं तो व्यायाम करें।

कुछ और जानकारिया बुखार के बारे में जो की आपके दैनिक जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है

मेरा नाम रूचि सिंह चौहान है ‌‌‌मुझे लिखना बहुत ज्यादा अच्छा लगता है । मैं लिखने के लिए बहुत पागल हूं ।और लिखती ही रहती हूं । क्योकि मुझे लिखने के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता है में बिना किसी बोरियत को महसूस करे लिखते रहती हूँ । मैं 10+ साल से लिखने की फिल्ड मे हूं ।‌‌‌आप मुझसे निम्न ई-मेल पर संपर्क कर सकते हैं। vedupchar01@gmail.com
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